अब कौन पूछता है, हम ज़िंदा है !!

अब कौन पूछता है, हम ज़िंदा है !!

रायपुर से करीब 40 किमी दूर, राष्ट्रीय राजमार्ग 53 पर बसे आरंग के शास्त्री चौक पर किराए के एक मकान में रहने वाली डॉली ट्रांसजेंडर समुदाय से है. छत्तीसगढ़ में यह समुदाय अब भी सामाजिक हिकारत, शासकीय उपेक्षा और गरीबी में जीवन जीने के लिए विवश है. डॉली यहाँ अपने साथ इसी समुदाय के चार और लोगों को रखती है, जो अपनी जरूरतों के लिए बहुत हद तक डॉली पर निर्भर है. अपने समुदाय में डॉली की प्रतिष्ठा गुरु की है, और साथ रहने वाले लोग चेला कहलाते है, जो अपने परिवार की उदासीनता और मुख्यधारा के भेदभाव से बचने यहाँ रहते हैं. जहाँ ये रहते हैं, उसे डेरा कहा जाता है.

डॉली की उम्र अभी सिर्फ 32 साल है, लेकिन अपने चेलों के देखभाल की बड़ी जिम्मेदारी उस पर है. खासकर, लॉकडाउन के कठिन समय में, जब उनकी आजीविका के लगभग सभी स्रोत ख़त्म हो गए है । छत्तीसगढ़ के ट्रांसजेंडर गरीबी में ही जीते हैं | अक्सर शादियों में और नए बच्चे के जन्म जैसे शगुनो में नाच-गा कर अपना जीवन चलाते हैं। उनमें से कुछ ट्रेनों में पैसे मांगते हैं, जबकि कुछ खानपान और टेंट-हाउस के काम में हाथ बँटाते हैं।

गरीब परिवारों को सुखा-राशन और सेनिटरी किट देने के दौरान, जब हम डॉली से मिले, तो उसने उदासी से बताया कि लॉकडाउन के दौरान उसकी सारी बचत समाप्त हो गई। इस दरमियान, उसने अपने समुदाय के कुछ और लोग, जो अलग-अलग जगहों पर रहते हैं, उन्हें भी मदद पहुंचाई थी । डेरा में रहने वाले चेलो की तो उस पर निर्भरता थी ही । डॉली के साथ रहने वालों में शिवा है, जो ब्यूटीशियन का काम करता था, लेकिन इन दिनों उसका काम बंद है। अब्दुल निसार, जो मदरसे में बच्चो को पढ़ाते थे, लेकिन अब बेरोज़गार हैं। ऑक्सफैम द्वारा सूखे राशन और सैनिटरी किट को देखते हुए, डॉली ने कहा कि पहली बार, कोई भी समूह या संगठन उनकी मदद करने के लिए आगे आया है। “अब तक हमारी मदद के लिए कोई नहीं निकला"| जबकि, खुद उसने पिछले महीने, महानदी पुल के पास घर लौटते राहगीरों को भोजन के कुछ पैकेट बांटे थे।

उसने हमसे कहा- "हमारे पास गुज़ारा चलाने के लिए अब पैसे नहीं बचे हैं।" उन्हें घर का किराया चुकाने के लिए 1600 रुपये लगते है. पिछले 3 महीनों का किराया बकाया है, और बिजली बिल का भी भुगतान नहीं किया जा सका है। उसे डर है कि कहीं मकान मालिक घर खाली करने न कह दे । अपने स्वयं के घर के बारे में पूछने पर उसने बताया कि, वे अपनी अनिश्चित स्थिति के कारण किसी भी आवास योजना के हकदार नहीं हैं। वह खुद का घर बनाने के लिए पैसे इकट्ठा करने की कोशिश कर रही है। उस जैसे अन्य के पास राशन कार्ड भी नहीं है ताकि, सब्सिडी वाला चावल मिल सके।

जब यह सब बात चल रही थी, तो वहीँ 29 साल की गहना ने तपाक से कहा, आप लोग हमारे घर तक आये, और जो मदद कर रहे हैं, वो तपते रेगिस्तान में पानी की धारा की तरह है।” पीले रंग की साड़ी पहने और माथे पर तिलक लगायी गहना की प्रेममयी मुस्कान के साथ मुस्कराते यह शब्द, मन को तस्सली दे रहे थे | हांलांकि, अन्दर एक बोझल शर्मिंदगी थी, कि हम जितना कर सकते हैं, यह उसक अंश मात्र भी नहीं है।

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मंदिर हसौद, रायपुर के एक उपनगर की तरह ही है, जो रायपुर को नया रायपुर से जोड़ता है। कई श्रमिक बस्ती वाला एक औद्योगिक क़स्बा, जहाँ इस्पात फैक्ट्री , रेलवे साइडिंग और गैस बॉटलिंग प्लांट है | यहाँ भी ट्रांसजेंडर समुदाय का एक समूह मुख्यधारा की चकाचौंध से अलग, तकलीफ में जीता है। 

आरंग से लौटते हुए, हमारी मुलाकात लगभग 45 वर्ष के शंकर से हुई। अपने जीवन यापन के लिए वह अस्थायी नौकरानी के रूप में घरेलू काम करती है। कोई भी उसे लंबे समय तक काम पर रखना नहीं चाहता । तालाबंदी के दौरान, शंकर भी अपनी रोज़ी रोटी के किल्लतों से जूझती रही | बहुत जगह काम तलाशती, लेकिन कुछ काम ही नहीं मिला । बैंक खाते में थोड़ी बहुत बचत से ही गुजारा चलाना पड़ा | वह तो अच्छा था कि शंकर के पास राशन कार्ड था, जिससे उसे पीडीएस से 10 किलो राशन मिलता रहा | शंकर का राशन कार्ड और आधार कार्ड इसलिए बन सका क्योंकि, उसके पास छत्तीसगढ़ सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा प्रदान किया जाने वाला ट्रांसजेंडर समुदाय का पहचान पत्र बन गया था, जिसे वे लोग कोथी कार्ड कहते हैं | इस समुदाय के लिए काम करने वाली मितवा संस्था को शंकर धन्यवाद देती है कि, उनकी मदद से यह सब दस्तावेज बना पाई | अपने झोपड़ीनुमा घर में अकेले रहते हुए शंकर को, लॉकडाउन के दौरान कुछ लोगों ने एक-दो बार सौ-पचास रुपये से मदद जरुर दी | शकर का यह घर आबादी जमीन में है, जिसका पट्टा अभी तक नहीं बन पाया है | उसे उम्मीद है, कि जल्द सरकार उसे स्थायी पट्टा दे देगी, ताकि वह थोड़े मान से अपना गुजर-बसर कर सके |

मंदिर हसौद चौक के पास ही, सहकारी समिति के सामने, जब हम शंकर के साथ और 6 लोगों को दाल, चावल, तेल, सोयाबड़ी, गुड़ और अन्य आवश्यक चीजों के साथ साबुन, मास्क और सैनिटाइज़र बाँट रहे थे, तो वहां से गुजर रहे लोग, और सहकारी समिति के कर्मचारी बड़े उत्सुकता से देख रहे थे। जैसे पूछ रहे हो, कि भला ट्रांसजेंडर के लिए भी ऐसे सहयोग करने की क्या जरुरत पड़ी है, जबकि, और लोग भी आस लगाये बैठें है !

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रायपुर के कृषि महाविद्यालय के पास, जोरा बस्ती में रहने वाले राजेंद्र के लिए जीवन उतना सरल नहीं है, जैसा उसके चेहरे की प्रसन्नता देख कर लगता है | वह 41 की उम्र में एक पेशेवर छत्तीसगढ़ी लोक-कलाकार हैं, और त्रिवेणी संगम नाम की एक लोक-कला समूह का सदस्य हैं। हांलांकि, बुलाये जाने पर वह अन्य ग्रुप में भी अपनी प्रस्तुति देता रहता है। पिछले 15 वर्षों से छत्तीसगढ़ और राज्य के बाहर कई गांवों और शहरों में उसने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है । लॉकडाउन से ठीक पहले, वह महाराष्ट्र में भंडारा और गोंदिया से कार्यक्रम दे कर लौटा था । लेकिन, लॉकडाउन ने उसे भूखों मरने छोड़ दिया । 

राजेन्द्र बताता है, कि बचपन से उसे सजने सँवरने का शौक था | 15 साल की उम्र में अपनी रूचि के कारण वह नाचा और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेता रहा । उसने बताया कि पिछले दो माह में मैंने कभी भी इस तरह की हताशा और लाचारी नहीं देखी, जैसा कि लॉकडाउन में घटित हुआ। "समाज हमारे (ट्रांसजेंडर) प्रति उदासीन रहा है, लेकिन अब, हम अवांछनीय हो गए हैं। अब हमारा जीवन और मृत्यु दूसरों को परेशान नहीं करते हैं।"

अगले ही पल चेहरे पर मुस्कान भर कर राजेंद्र, हमारी तरफ देखते हुए कहता है कि "आप जैसे लोगों ने हमारे बारे में इतने कठिन समय में सोचा है, यह मेरे लिए गर्व का क्षण है"। 12वीं तक पढ़े, राजेन्द्र ने आगे की पढ़ाई, B.Sc पहले साल में ही छोड़ दिया | परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे, कि उसे रायपुर में कॉलेज की पढाई करा पाते |

अपने समुदाय के दबाव के बावजूद, वह अपने माता-पिता के साथ ही रहता है। उनके घर में पीडीएस का राशन तो मिलता है, पर अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता | वह कहता है कि, हम अन्य योजनाओं के हकदार होते, यदि जोरा एक गाँव के दर्जे से रायपुर नगर निगम का हिस्सा न बन गया होता | वह कहता है, कम से कम आज मैं मनरेगा मजदूर के रूप में काम करता, क्योंकि, अभी तो कोई भी हमें मज़दूरी के काम पर नहीं रख रहा है | 

 

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