Recommendations on proposed amendments to the Indian Forest Act 1927

Recommendations on proposed amendments to the Indian Forest Act 1927

 विषय- “भारतीय वन अधिनियम 1927 के प्रस्तावित संशोधनों को रद्द करने बाबत

त्तीसगढ़ में आदिवासी व अन्य वन-निर्भर समुदायों की आजीविका, पहचान एवं गरिमा वनों से जुडी हुई है. प्रदेश के 14[1] जिले पूर्ण व 6 आंशिक रूप से भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित एवं आदिवासी-जन व वन-क्षेत्र बहुल है. पिछले 150 वर्षों में आदिवासी व अन्य वननिर्भर समुदायों पर हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने एवं वन क्षेत्रों में व्यापक भूमि-सुधार और लोकतान्त्रिक अभिशासन लागू करने के उद्देश्य से ‘अनुसूचित जनजाति व अन्य परंपरागत वन-निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006’  बनाया गया था.  परन्तु, इस बीच भारतीय वन अधिनियम, 1927 जिसके द्वारा वनों का प्रशासन चलता है, में केंद्र सरकार के वन, पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित जनविरोधी प्रावधानों से प्रदेश में करीब 12 हज़ार गाँवो में निवासरत लाखों परिवारों के लिए ऐतिहासिक अन्याय के चक्र से निकलना असंभव हो जायेगा.

भारतीय वन अधिनियम में प्रस्तावित एकपक्षीय संशोधन का वननिर्भर समुदाय, उनके संगठन और प्रदेश में आदिवासी व वन अधिकारों पर काम करने वाले सभी संगठन अपना विरोध जाहिर करते हैं.

हम आपके द्वारा उठाये गए उस कदम की सराहना करते हैं, जिसमें आपने अप्रेल 2019 को केन्द्रीय वन मंत्री को पत्र लिख कर प्रस्तावित संशोधनों को ख़ारिज करने की मांग की थी. आपने स्पष्ट कहा था कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के हित में इन प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं होने दिया जायेगा.  हम छत्तीसगढ़ सरकार की वन अधिकारों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता पर विश्वास करते हैं, जैसा कि राज्य में विधानसभा चुनाव के वक्त अपने जनघोषणा-पत्र में व्यक्त की गयी थी.

हमें आशा है, कि आदिवासी व परम्परागत वननिवासियों के लिए अति महत्त्व के इस गंभीर विषय पर राज्य सरकार, जल्द ही वनाधिकार के मुद्दे पर कार्यरत जनसंगठनो से संवाद करेगी.

दिनांक 23 अगस्त 2019 को रायपुर (छत्तीसगढ़) में एकत्रित हो कर, हम, छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच, छत्तीसगढ़ बचाओं आन्दोलन, भारत जन आन्दोलन, सर्व आदिवासी समाज, आदिवासी भारत महासभा, अ.भा.वन आन्दोलन मंच सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी व वन-अधिकार के मुद्दों पर संघर्षरत जन-संगठन भारतीय वन अधिनियम के जरिये वन अधिकारों को छीनने के प्रयासों का विरोध करते हुए, निम्न कथन जारी करते है.  

  1. हमारा मानना है कि भारतीय वन अधिनियम, 1927, 19वी सदी में अंग्रेजी राज में बना वन-प्रशासन का एक कानून है, जिससे वननिर्भर समुदायों पर ऐतिहासिक अन्याय हुआ है, उसे 21 सदी में संशोधन कर जारी रखना, वनों के औपनिवेशिक शासन को कायम रखते हुए कॉर्पोरेट लूट को बढ़ाने का एक नया रास्ता है.
  2. सदियों से वनों के साथ रहते आये समाज के पारम्परिक ज्ञान व व्यवहार आधारित संरक्षण क्षमता को नकारते हुए, वनों को महज “उत्पादन ईकाई” मानने वाले भारतीय वन कानून के नवीन स्वरुप का मसौदा, जिसे केंद्र सरकार ने पिछले 7 मार्च को जारी किया था, और जिस पर राज्य सरकार को 7 अगस्त तक अभिमत माँगा गया था, का हम पूर्णतः विरोध करते हैं.
  3. वन पर निर्भर आदिवासी व अन्य वन निवासी समुदायों के वन अधिकारों को कुचल कर, वन संसाधनों पर विभाग का निरंकुश और कठोर नियंत्रण स्थापित करने वाले प्रस्तावित प्रावधानों से वन पर निर्भर समुदायों के मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन होगा, अतः संशोधन के इस मसौदे को हम तुरंत वापस लेने की मांग करते हैं.
  4. हम मानते है कि, प्रस्तावित मसौदा, मुख्य रूप से वन अधिकार मान्यता कानून, 2006 पर खुला हमला है. इसके जरिये वन निर्भर समुदायों को अपराधी साबित करने की मंशा जाहिर होती है.  यह न सिर्फ एक जन-विरोधी कदम है, बल्कि, देश के संघीय ढांचे में निहित कानून बनाने की शक्ति का अतिक्रमण भी है.
  5. यदि भारतीय वन कानून के यह प्रावधान लागू होते हैं तो, देश के कमजोर वर्ग के लिए सामाजिक न्याय और समता प्राप्त करने में बड़ी बाधा बनेगे.   
  6. हम आहत है कि, उक्त संशोधन में ऐसे प्रावधान रखे गए हैं, जैसे, लोगों के उपर शंका के आधार पर गोली चलाना; वन अपराध के आरोपितों को स्वयं निर्दोष साबित करने का भार डालना, आग लगने की स्थिति पर पूरे गाँव को जुरमाना करना, आरोपितो को अभिरक्षा में लेने के लिए बल प्रयोग करना, और कस्टडी में लिए गए बयान को न्यायालय में मान्य होना; जिससे वन निर्भर समुदायों को अपराधी साबित कर, उन्हें निष्पक्ष न्याय प्राप्त करने से रोका जा सकेगा.
  7. हमें आशंका है, कि भारतीय वन कानून में ऐसे प्रावधान, जैसे वन क्षेत्र को आरक्षित घोषित कर देना, यहां तक कि वनाधिकार मान्य भूमि और सामूहिक संसाधन की भूमि को दबाव डाल कर व सहमति के बिना अर्जित कर लेना तथा लोगों के निस्तार अधिकार को प्रतिबंधित कर देना, आदि को शामिल करने से आदिवासियों पर हुए ऐतिहासिक अन्याय बड़े पैमाने पर दोहराये जायेंगे
  8. हम अपेक्षा करते हैं, कि संविधान के अनुच्छेद 244(1) में व्यक्त पांचवी अनुसूची के प्रावधानों का पालन करते हुए, अनुसूचित क्षेत्रों और अन्य क्षेत्र जहाँ आदिवासी निवासरत है, के संसाधनों का गैर-आदिवासी निकायों को हस्तांतरण प्रतिबंधित हो. (जैसा, खनन के सन्दर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने समता जजमेंट में कहा है). इसी अनुरूप, वन-क्षेत्रों में जमीन, जिस पर आदिवासियों के अधिकार मान्य है, को आरक्षित वन के रूप में अधिसूचित न किया जाये.
  9. अत:, हम मांग करते है, कि छत्तीसगढ़ शासन स्पष्ट करे कि केंद्र सरकार के वन,पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी किये गए संशोधन के इस मसौदे पर क्या जवाब दिया गया. हम स्तब्ध है, कि इस विषय पर राज्य सरकार ने अब तक जनता से कोई परामर्श किया और न ही अपने जवाब को सार्वजनिक किया।
  10. हमारी मांग है, कि राज्य सरकार शीघ्र इस मुद्दे पर विस्तृत परामर्श आयोजित कर, वन निर्भर समुदाय, उनके संगठन और जनसंगठनों से राय लें.
  11. हमारी मांग है कि वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के युगान्तरकारी उद्देश्य के अनुरूप प्रदेश के 32 लाख हेक्टेयर में मौजूद वन संसाधनों को ग्रामसभा के सामुदायिक नियंत्रण में देकर एवम वन प्रशासन को लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के लिए, ग्रामसभाओं को अपने वनक्षेत्र के प्रबंधन एवं संरक्षण का अधिकार स्पष्ट रूप से तुरंत प्रदान करे.
  12. हम मांग करते हैं कि राज्य शासन ‘क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि कानून’ (CAF) के अंतर्गत क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि को वनाधिकार मान्यता कानून 2006 की मंशा के अनुरूप, ग्रामसभा के नियंत्रण तथा निर्णय से वनीकरण के उद्देश्य के लिए सीधे ग्रामसभा को हस्तांतरित करे.
  13. हम अपेक्षा करते है कि राज्य सरकार आदिवासी अधिकारों और जैव-विविधता पर किये गए अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का सम्मान करते हुए, भारतीय संविधान में व्यक्त प्रावधानों और वन अधिकार मान्यता कानून की रक्षा करते हुए, प्रदेश के आदिवासियों के हितों के लिए प्रस्तावित मसौदे को ख़ारिज करते हुए, भविष्य में वनाधिकार उल्लंघनों को रोकने के प्रति सजग रहेगी.

भवदीय

रेणुका एक्का                                                            
छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच      

आलोक शुक्ला
छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन

सोनाऊ राम नेताम 
सर्व आदिवासी समाज

भोजलाल नेताम                                     
आदिवासी भारत महासभा

बिजय भाई    
भारत जन आन्दोलन

देवजीत नंदी
अ.भा.जंगल आन्दोलन मंच

1] गौरेला, पेंड्रा, मरवाही को मिलाकर घोषित किया गया नया जिला को जोड़कर

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We work towards fair sharing of natural resources and ensuring better livelihoods for forest-dependent communities

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