शिक्षक दिवस पर सावित्री बाई फुले को श्रद्धांजलि

शिक्षक दिवस पर सावित्री बाई फुले को श्रद्धांजलि

देश की ऐसी पहली महिला शिक्षिका जिसने उस वंचित समाज की लड़कियों की पढ़ाई के बारे में सोचा जिसको जाति वादी और पितृ सत्ता सोच वाले नेता कभी नही सोच पाए। में बात कर रहा हूँ देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले की।

आज शिक्षक दिवस है लोग याद करते है आज के दिन देश के पहले उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को। लेकिन जो लोग जाति वादी और पितृ सत्ता वाली मानसिकता के खिलाफ है वो आज के दिन देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले को जरूर याद करेंगे। 

3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में जन्मी सावित्री बाई फुले ने उस समय महिलाओ को आज़ादी दिलाने की बात कही जब महिलाओं को पढ़ने की आजादी नहीं थी। लेकिन फुले ने हिम्मत दिखाते हुए न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि 1848 में पहला महिला स्कूल पुणे में खोला।

अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले.

28 जनवरी 1853 को गर्भवती बलात्कार पीड़ितों के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की. 

सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया.

उनका ये संघर्ष कितना कठिन रहा इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब वह स्कूल जाती थीं तो जातिवादी और पितृसत्ता के विरोधी लोग पत्थर मारते थे, उन पर गंदगी फेंक देते थे. महिलाओं का पढ़ना उस  समय पाप माना जाता था. सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर जाती थीं ताकि स्कूल पहुंचकर अपनी गंदी साड़ी बदल सके।

वैसे तो उनके जीवन पर जितना लिखा जाए या जितना पढा उतना ही कम है क्योंकि उनका संघर्ष आज भी उन लोगो को प्रेरणा देता है जो आज भी जाति वादी और पितृ सत्ता वाली सोच के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे है। 

उनके संघर्षो की बदौलत ही आज अनेक लड़कियां है जो वंचित समाज से आने के बावजूद वो आज पढ़ रही है और सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त हो रही है। लेकिन अभी भी बहुत सी लड़कियां ऐसी है जो स्कूल इस कारण से छोड़ देती है क्योंकि उनके गांव से स्कूल कुछ किलोमीटर की दूरी पर होता है, रास्ते पर कुछ लड़के खड़े होते है जिनके डर की वजह से लड़कियां स्कूल तक नही जा पाती है। इसको बदलना होगा इसके लिए एक पुरुष होने के नाते हमको देश की आधी आबादी के साथ खड़ा होना पड़ेगा। हमको समता मूलक समाज की स्थापना करनी पड़ेगी। और ये तभी हो पाएगी जब पुरुष ये स्वीकार करे कि देश अकेले पुरुष नही बल्कि आधी आबादी के साथ मिलकर चलाना होगा तभी हम एक सशक्त भारत मे रूप में पहचाने जायेगे।।
 

Arpit Dheeman is the Muzaffarnagar District Programme Officer at Oxfam India.  

(Illustration by Bhavya Kumar for the book 'Like A Girl')

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