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Jan 23, 2017

खेल - जेण्डर आधारित असमानताओं को उजागर करने को एक सषक्त माध्यम

लता नेताम

लोकआस्था सेवा संस्थान छत्तीसगढ़ राज्य के जिला गरियाबंद के छुरा ब्लाक के अतिंम छोर उडिसा के बॉर्डर से लगा हुआ है। आदिवासी बाहुल्य यह क्षेत्र पांचवी अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहां के निवासरत लोगों में सबसे ज्यादा कमार, भूजिया, गोड, जनजाति के समुदाय हैं। लोक आस्था सेवा संस्थान समुदाय के विभिन्न मुददों को लेकर कार्य कर रही है, जैसे जेण्डर समानता, स्वास्थ्य, षिक्षा, आजीविका व बाल अधिकार के मुददों पर जनजागरण। 

जेण्डर समानता के तहत 16 गांव मे गांव स्तर पर न्यायसमिति का गठन किया गया है और महिला व युवा समुहों के साथ सतत् रूप से कार्य किया जा रहा है। जब कार्य शुरू किया तो महिलाएं सिर्फ दारू को ही हिंसा मानती थीं और हर बैठक में सिर्फ उसी बारे में चर्चा करती थीं। उनका मानना था कि दारू बंद हो जाएगी तो हिंसा खत्म हो जाएगी। अतः लोक आस्था ने दारूबंदी के माध्यम से ही गांवों में अपनी पहुंच बनाई। फिर धीरे-धीरे जेण्डर आधारित असमानताओं और भेदभाव के प्रति समुदाय को जागरूक करने का कार्य किया। दारूबंदी करना महिलाओं के लिए बहुत बढ़ी चुनौती थी। जैसे मालियार गाँव के कई पुरूषों ने महिलाओं को चुनौती दी कि गाँव मे दारूबंदी करके दिखाओ। महिलाओं ने शर्त मंजूर कर ली और बहुत संघर्षों के बाद मलियार में दारू बंद करवा दी। ये सब देखकर गांव-गांव मे महिलाओं के साथ हो रही हिंसा के प्रति कुछ पुरूष साथी साथ आए।

अब समय था हिंसा के बारे में महिलाओं, युवाओं और समाज की सोच को व्यापकता देने का। इस ओर सबसे बड़ा माध्यम बना 26 नवम्बर से 10 दिसम्बर तक मनाया जाने वाला महिला हिंसा के विरूद्व पखवाडा, जिसे लोक आस्था बढ़चढ कर मनाती है। इसके पीछे सोच है कि पितृसतात्मक समाज होने के कारण महिलाओं के खि़लाफ गलत सामाजिक प्रथाएं (सोषल नार्म) एवं पंरपराएं चली आ रही हैं। इसे बदलने के लिए हम सभी को एक जुट होना होगा और अपने घर परिवार और समाज मे परिवर्तन लाना होगा। विषेषकर इन सामाजिक प्रथाओं में बदलाव लाना होगा। 

2016 में लोक आस्था ने पिछले वर्ष जैसे जेण्डर आधारित असमानता और भेदभाव पर चर्चा शुरू करने और इस ओर सोच व समझ बढ़ाने के लिए खेल का माध्यम चुना। इस तारतम्य में पहली बार 5 पंचायत जिसमें देवरी, सिवनी, पेन्ड्रा, भरूवामुड़ा और दादरगांव शामिल हैं, से 22 गांव की महिलाओं को कबड्डी खेलने के लिए आमंत्रित किया गया। बहुत प्रोत्साहित करने व परिवारों से बात करने के बाद उन्होंने कबड्डी खेलने के लिए अपनी सहमती दी। लेकिन कार्यक्रम के दिन महिलाएं मैदान मे उतरने से कतराने लगीं तथा पुरूषो ने भी उन्हें मना किया। इनमें से कुछ लोग आपस में कानाफूसी कर रहे थे कि महिलायें थोड़ी ही कबड्डी खेलेंगी यदि कबड्डी खेलना है ही तो हम पुरूष खेलेंगे। 

ये माहौल जैसे महिलाओं को चुनौती दे रहा था, कुछ देर बाद चार गांव मलियार, निसेनीदादर, सेहरापानी जटियातेाड़ा व भरूवामुड़ा की महिलाओं ने मैदान में उतर कर सदियों से सामाजिक प्रथाओं की बंधी बेड़ियों को तोडा। सभी संवेदनषील पुरूषों ने उन्हें प्रोत्याहन दिया, उन्हें सराहा। महिलाओं को मैदान तक लाना अपने आप में किसी संघर्ष व चुनौती से कम नहीं था। इसमें कई समस्याओं से जूझना पड़ा, लेकिन महिलाओं ने भी हार नही मानी और मैदान में उतर कर पुरूषों को खेल के माध्यम से दिखा दिया कि महिलायें भी किसी से कम नही है।

उसी प्रकार एक और खेल के माध्यम से पुरूषों में भी महिलाओं के पारंपरिक कार्यों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ाने का प्रयास किया गया। हमेषा से महिलायें ही अपने सिर पर मटका उठाती हैं और पुरूषों को यह बहुत ही आसान लगता है और इस कार्य को ज़्यादा मान्यता नहीं मिलती। इस हेतु इस बारे में महिलाओं और पुरूषों के बीच लोटा दौड का आयोजन किया गया। पुरूष इस कार्यकम में भाग लेने के लिए ही तैयार नही हो रहे थे क्योकि एक सोच बना हुआ है कि ये काम महिलाओं का है तो पुरूष कैसे अपने सिर पर लोटा को उठा कर दौड़ लगायेंगे। महिलाएं पुरूषों को उलाहना देने लगीं कि पुरूषों में उतनी ताकत कहां है कि वे अपने सिर पर लोटा उठाकर दौड़ सकें। लोक आस्था के कार्यकर्ताओं ने पुरूषों को समझाया, जिससे सेहरापानी में लोटा-दौड में 4 पुरूषों ने भाग लिया तथा जटियातोरा में भी पुरूषों ने लोटा-दौड़ में भाग लिया। 

कार्यक्रम के बाद जेण्डर आधारित भेदभाव पर चर्चा हुई और उपस्थित अतिथियों ने भी इस भेदभाव को दूर करने के लिए कहा। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने ऐसा कार्यक्रम पहली बार देखा था। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कुछ लोगों ने कार्यक्रम के माध्यम से देने वाले संदेष को समझा और अपने गांवों में इस बारे में बात की। इस दौड़ ने आस पास के गाँव में जेंडर समानता विषय को एक नया आयाम व परिभाषा प्रदान किया काफी दिनों तक लोगों के बीच में चर्चा चलती रही कि महिलाओं के काम और पुरूषों के काम में आखिर फर्क क्यं है?

 

सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देता संगठन

 

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