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Dec 5, 2016

सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देता संगठन

Anu Verma

 ‘‘भारतीय शास्त्रों में नारी को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है‘‘, ‘‘जहां नारी को पूजा जाता है, वहां सुख, शांति व समृद्धि का वास होता है‘‘, ‘‘वैदिक काल से ही महिलाएं को शक्ति का रूप माना जाता हैं‘‘, ‘‘भारतीय महिलाएं निरंतर तरक्की कर रही हैं,‘‘ ‘‘वे पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है‘‘, ‘‘हमारे देष में महिला को बराबरी का दर्जा मिल गया है‘‘, ‘‘महिलाएं अबला नहीं, वे सशक्त हैं‘‘। हम ये आए दिन अखबारों, रेडियो, टी.वी में पढ़ते हैं, सुनते हैं या देखते हैं। ये बातें सच लगती हैं और ऐसी बातों को सब मानते हैं। लेकिन क्या ये वाकई सच है, क्या सही में ये हमारे समाज की सच्चाई है? 

मेरे सामने हुई एक घटना ने इन सामाजिक मान्यताओं पर प्रश्न चिह्न लगा दिया। ये घटना कुछ सालों पहले अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस से कुछ ही दिन पूर्व की है, जब मैं निम्बाहेडा से प्रतापगढ़ (राजस्थान में है) जा रही थी। बस लोगों से खचाखच भरी हुई थी। इसी भीड़ में कुछ गांव की महिलाएं एवं पुरूष भी बस में चढ़े। उनमें से कुछ महिलाएं सीट न मिलने के कारण नीचे बैठ गईं। कुछ देर बाद इनमें से एक महिला का जी घबराने लगा और उसे उल्टी हो गई। जब उसने उल्टी की तो एक महिला के कपड़े खराब हो गए। जैसे ही उस महिला के कपड़े खराब हुए, उसने यह बात अपने साथ वाले पुरूष को बताई और फिर शुरू हुआ गांव की महिला को डाटने और चिल्लाने का सिलसिला। थोड़ी देर बाद उसके साथ वाला पुरूष उठा और उसने गांव की महिला को लातों से मारना शुरू कर दिया। 

पुरूष के इस पुरूषत्व को और गांव की उस महिला की बेबसी को पूरी बस देख और सुन रही थी। लेकिन किसी को उस बेचारी महिला पर दया नहीं आई। दया आती भी तो क्यों, उस महिला ने शहर की महिला के कपड़े खराब करने का दुस्साहस जो किया था। जब मैंने पुरूष के इस घृणित कृत्य का विरोध किया तो वो तो रूका ही था कि कहीं से एक आवाज सुनाई दी, ‘‘अरे मेडम आपके कपड़े थोड़े ही खराब हुए हैं‘‘। मैं अवाक् रह गई!!

इस वाक्ये ने मुझे झंकझोड कर रख दिया है। बहुत देर तक मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उस महिला की गलती क्या थी - क्या शहर की महिला के कपड़ों पर उल्टी करना ही उसकी एक मात्र गलती थी या फिर गांव में पैदा होना, या फिर गरीब होना या फिर महिला होना ही उसकी गलती थी? 

सवाल तो ये भी है कि उस आदमी को इतनी हिम्मत कहां से मिली कि वो लोगों से भरी बस में सबके सामने एक महिला को लातों और जूतों से मारे? क्या उसे ये हक मैंने, आपने, हमारे पितृसत्तात्मक समाज ने दिया है या मूक बने दर्शकों ने या फिर लात-जूते खाती उस महिला की चुप्पी ने दिया? 

समझ नहीं आता कि हम सबकी संवेदनशीलता कहां लुप्त हो गई है, हम किसी भी महिला पर अत्याचार होते देखकर चुप कैसे रह सकते हैं और महिला को मारने के लिए किसी को उकसा कैसे सकते हैं। हमें महिला की तकलीफ, उल्टी करने के पीछे उसकी शारीरिक तकलीफ और मार खाते हुए उसकी मानसिक और भावनात्मक तकलीफ महसूस क्यों नहीं हुई?

ये भी समझ से परे है कि हम लोग जो खुद को इंसान कहते हैं, हम सबकी इंसानियत ऐसे समय कहां चली जाती है, क्यों बस में बैठे सभी लोग उस बेबस महिला के लिए कुछ नहीं बोले। यहां तक कि उसके साथ में सफर कर रहे उसके साथी पुरूष और महिलाओं ने भी उसे अकेला छोड़ दिया।

जब मैंने पाया कि मैं कुछ भी समझने की स्थिति में नहीं हूं तो मुझे उस महिला की याद आई जिसने एक आदमी से लात-जूते खाए थे। उसे याद करते ही मेरे ज़हन् में ये प्रश्न कोंधने लगे कि वो महिला जिसने पूरी बस वालों के सामने एक आदमी से मार खाई हो वह कैसी होगी, वह क्या सोच रही होगी, वह क्या महसूस कर रही होगी? क्या उसकी आगे की ज़िन्दगी  या यूं कहें कि उसके आगे के कुछ दिन, महीने सुकून से कट सकेंगे, क्या उसे शांति मिल सकेगी, क्या उसे चैन मिल सकेगा? ज़िन्दगी में जब भी उसे वो वाक्या याद आएगा तब क्या वो अपने आप से नज़रें मिला सकेगी? 

एक झटके में उसका आत्मविश्वास, उसका आत्मसम्मान, उसका स्वाभिमान एक आदमी के जूतों के नीचे दब कर रह गया और बाकी सब मूक दर्षक बने रहे। सच में हम में से कोई भी उसके लिए कुछ भी न कर सका। क्या पता इसी तरह हर क्षण कितनी ही महिलाओं का आत्मसम्मान किसी न किसी तरह, किसी न किसी के द्वारा यूं ही कुचल दिया जाता है। 

क्या पता कल उस गरीब महिला की जगह मैं हूं, आप लोग हों और बाकी लोग सिर्फ तमाशा देखते रहें, एक महिला के स्वाभिमान, उसके आत्मसम्मान को कुचल देने का तमाशा!!!

अब कई सालों बाद जब ये घटना याद आती है तो सहसा ही कामराज गांव, गरियाबंद जिला, छत्तीसगढ राज्य की आदिवासी समुदाय की वो दीदीयां याद आ जाती है। गांव के कुछ पुरूष वहां की लड़कियों और महिलाओं को बहुत परेशान करते थे। गांव की पांच दीदीयों ने उनका विरोध किया। ये सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा, बात इतनी बढ़ गई कि दीदीयों को थाने में एफ.आई.आर करनी पड़ी। पुलिस कर्मी इन पुरूषों को गिरफ्तार करके ले गए। कुछ ही समय में गांव वालों ने इनकी बेल करवा ली। फिर इनके गांव वालों ने 15 गांवों के लोगों को बुलवाकर महापंचायत बैठाई, जिसमें इन दीदीयों को बहुत अपमानित किया गया। गांव वालों ने मजबूर किया उन पुरूषों के खिलाफ केस वापस लेने के लिए, जिन्होंने पूरे गांव के सामने उनका अपमान किया और उन्हें मानसिक यातनाएं दीं। पर वे अडिग रहीं और डटकर खडी रहीं अपने आत्मसम्मान व स्वाभिमान की लड़ाई में। इनके परिवार व पति भी इनके खिलाफ हो गए। पर दीदीयों ने अपने आत्मसम्मान को किसी के आगे झुकने नहीं दिया - न गांव-समाज के आगे, न पुलिस-प्रशासन के आगे, न अपने पतियों के आगे और न ही अपने घर वालों के आगे। इन दीदीयों की परिस्थिति उस बेबस महिला के जैसे ही है - गांव की, गरीब, बिना पढ़ी-लिखी, एवं महिला। लेकिन एक बहुत बढ़ा फर्क था - ये संगठित थीं, सजग व जागरूक थीं। 

ये एक स्थापित सत्य है कि महिलाओं के विरूद्ध हिंसा को इतनी व्यापक स्वीकृति है कि वो सामाजिक मान्यता (सोशल नाॅर्म) बन गई है। ऐसे ही कई अनुभवों से ये पुनःस्थापित होता है कि इस सामाजिक मान्यता के खिलाफ संघर्ष में सफलता संयुक्त व संगठित रूप से आवाज़ उठाने, चुप्पी तोड़ने और नई व प्रगतिशील सोच को अपनाने से ही मिलेगी।

 

अनु वर्मा,प्रोग्राम ऑफिसर छत्तीसगढ़ , ऑक्सफेम इंडिया  

 

नेशनल क्राइम रिकाॅर्डस ब्यूरो, 2014 के अनुसार भारत में महिलाओं के विरूद्ध हिंसा 2005 से 2014 के बीच सतत् रूप से बढ़ी है। इन आंकडों पर आधारित इंडिया स्पेंड के पिछले एक दशक के विश्लेषण के अनुसार हर घंटे 26 महिलाओं के विरूद्ध हिंसा का मामला दर्ज हुआ है यानि हर दो मिनट में एक महिला के विरूद्ध हिंसा का केस दर्ज होता है। पिछले दशक में पति और रिश्तेदारों द्वारा अपनी पत्नि के विरूद्ध अपराध के 909713 मामले दर्ज हुए यानि हर घंटे में 10। सबसे ज्यादा पति और रिश्तेदारों द्वारा अपनी पत्नि के विरूद्ध अपराध के मामले दर्ज हुए, दूसरे सबसे ज्यादा मामले महिला की लज्जा भंग करने के- 470556 और अपहरण के मामले तीसरे नंबर पर दर्ज हुए - 315074। क्रमशः बलात्कार के 243051 मामले, महिलाओं के अपमान के 104151 और दहेज हत्या के 80833 मामले दज हुए।

 

 

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